सुखी रहने के उपाय
*"मनुष्य अल्पज्ञ है। उससे गलती होना स्वाभाविक है। गलती होने पर उसे दबाएं छुपाएं नहीं, बल्कि अपनी गलती को स्वीकार करें, और उसे दूर करें। तभी आप सुखी हो सकते हैं, अन्यथा नहीं।"*
आपको संसार में ऐसे बहुत से मूर्ख मनुष्य मिलेंगे, जो गलती हो जाने पर अपने मिथ्या अभिमान आदि दोषों के कारण अपनी गलती को स्वीकार नहीं करते। दूसरे बुद्धिमान लोगों को मूर्ख समझते हैं, तथा उन्हें मूर्ख बनाने का व्यर्थ प्रयत्न करते हैं। वे समझते हैं कि *"मैं सामने वाले व्यक्ति को बहका लूंगा। मैं इसे मूर्ख बना लूंगा। यह मेरी चालाकी को क्या समझेगा?"*
ऐसे मूर्ख लोग यह नहीं जानते, कि जितनी बुद्धि आपके पास है, आपसे ज्यादा सामने वाले व्यक्ति के पास है। जैसा मन आपके पास है, वैसा ही उसके पास भी है। यदि आप उसे मूर्ख बनाने की सोचते हो, तो क्या वह दूसरों को मूर्ख बनाने के बात नहीं सोचता होगा? यदि वह भी सोचता होगा, तो क्या मनोविज्ञान के आधार पर वह आपकी बात नहीं समझ लेगा, कि यह भी मुझे मूर्ख बना रहा है। *"और जब आप की चालाकी/ धोखाधड़ी को वह समझ जाएगा, तो ऐसी स्थिति में उसका गुस्सा 4 गुना बढ़ेगा। और परिणाम यह होगा, कि तब वह आपको महामूर्ख समझेगा, और आप से संबंध तोड़ देगा। उसका ऐसा करना बिल्कुल उचित होगा और आपकी मूर्खता एवं दुष्टता का दंड होगा। "क्योंकि दंड के बिना कोई सुधरता नहीं है।"*
जिस व्यक्ति से आप लाभ ले रहे थे, उससे संबंध टूटने पर आपको अपनी मूर्खता समझ में आएगी कि *"यदि मैं अपनी गलती स्वीकार कर लेता, और उसे मूर्ख बनाने की कोशिश न करता, तो जीवन भर उससे लाभ लेता रहता। ऐसी हानि न उठाता। अब उसने मुझसे संबंध तोड़ दिया है। अब वह मुझ पर विश्वास नहीं करेगा, और जो मुझे लाभ दे रहा था, वह लाभ अब मुझे नहीं देगा।"* अधिकांश लोग ऐसे हानि उठाने के बाद ही अपनी मूर्खता को समझ पाते हैं।
मेरा आप सब से निवेदन है, कृपया ऐसी मूर्खता करने से बचें। बल्कि ऐसा सोचें, कि *"सभी के पास बुद्धि है। सभी के पास मन है। सभी लोग एक जैसा सोचते हैं। इसलिए मैं किसी को मूर्ख बनाने की मंशा न रखूं। मुझे ईमानदारी सभ्यता और सच्चाई से जीना चाहिए। मैं ऐसे ही ईमानदारी से सबके साथ व्यवहार करूंगा। ताकि मुझे सबसे जीवन भर लाभ मिलता रहे, और मैं भी दूसरों को लाभ देता रहूं।"*
यदि आप से गलती हो जाए, तो कोई बड़ी बात नहीं है। गलती सबसे होती है, आपसे भी हो गई। गलती होने पर चिंता न करें, बल्कि चिंतन करें। *"बुद्धिमत्ता इस बात में है, कि अपनी गलती को स्वीकार करें। जिसके प्रति आपने गलती की उससे माफी मांगें। हृदय से माफी मांगें। अपनी गलती का प्रायश्चित करें। जिसके साथ गलती की, उसको कुछ गिफ्ट दें, जिससे कि उसका गुस्सा कुछ शांत हो जाए। यह आपका एक प्रकार से प्रायश्चित होगा। फिर भविष्य में गलती न करने का दृढ़ संकल्प करें।"*
इस प्रक्रिया में तीन बातें सोचें। *"पहली बात - गलती क्या हुई? दूसरी बात - गलती क्यों हुई? आपको अपने अंदर से उत्तर मिलेगा, - आपने लापरवाही की, झूठा अभिमान दिखाया। अपनी झूठी शान दिखाई, इत्यादि कारण आपको अपने अंदर से ही पता चल जाएंगे। तीसरी बात - पक्का निश्चय करें, कि अब ऐसी गलती नहीं करूंगा।"*
और भविष्य में सावधान रहें भी, जिससे कि वह गलती दोबारा न हो। या और भी कोई गलती न हो। *"ऐसा करने से आपका किसी से संबंध भी नहीं टूटेगा, आप बुद्धिमान कहलाएंगे और सभी लोगों से जीवन भर लाभ उठाएंगे।"*
----- *स्वामी विवेकानंद परिव्राजक, रोजड़, गुजरात।*
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