सबका एक डीएनए
*एक डीएनए होना राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा की गारंटी नहीं होता।*
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कौरवों व पांडवों का भी डीएनए एक ही था, लेकिन फिर भी कौरव अधर्म पर थे और पांडव धर्म पर - और कौरवों का नष्ट होना आवश्यक था - स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण ने भी यही चाहा यह वैश्विक, प्रामाणिक सत्य है। इसलिए कौरवों को हतोत्साहित करना ही सत्य था न कि उनको किसी भी प्रकार से पांडवों के समान प्रदर्शित करना।
बेशक भारतीय हिन्दू और मुसलमान का डीएनए एक ही है।
परंतु यह भी तो सच है कि,
आज 90% भारतीय मुसलमान गाय को खाता है , 100% भारतीय मुसलमान अपनी ही बहनों से निकाह कर थोक में बच्चे पैदा करते हैं, 80% भारतीय मुसलमान (काफिरों) हिन्दुओं के खिलाफ जिहाद कर रहे हैं - और भारत को इस्लामिक राष्ट्र घोषित कर 58वाँ मुस्लिम राष्ट्र बनाने की तैयारी कर रहे हैं।
डीएनए एक होने से क्या फर्क पड़ता है। मुस्लिम मजहब में परिवर्तित होने के बाद कुरान तो, अगर उसके अपने सगे भाई-बहिन, मां-बाप से भी इस्लाम पर ईमान ना रखने पर नाता तोड़ कर उनको काफिर समझ कर उनके खिलाफ भी जेहाद का हुक्म देता है। जेहादी बन कर वे लोगों की हत्याऐ करते समय, महिलाओं से ब्लातकार करते समय, लूट पाट करते, महिलाओं का अपहरण करते समय, लव जेहाद करते समय, गैर मुस्लिम लड़कियों का शारीरिक और आर्थिक शोषण करते समय किसी का डीएनए चैक नहीं करते।
जिस कुरान व अन्य इस्लामिक साहित्य में लिखा है कि काफ़िर को काट दो, उनकी बहन-बेटियों को अपनी रखैल बना लो तो तुम्हें जन्नत मिलेगी और वहाँ 72 हूरें मिलेंगी और मुसलमान मर्द की कामुक शक्ति बहुत बढ़ जाएगी। ऐसे मजहब की धार्मिक परिभाषा खत्म करनी चाहिए व उसे बैन कर खत्म करना चाहिए। और इसको संगठित राजनीतिक अपराधियों का गिरोह घोषित किया जाना चाहिए। कुरआन पर भी प्रतिबंध लगाया जाये। ज्यादा नहीं तो उसे हतोत्साहित करने के अनेक प्रयास तो बनते हैं।
यदि इस दिशा विशेष में आज तक किसी भी राष्ट्रवादी संगठन या सरकार की तरफ से कोई कार्य नहीं हुआ।
केवल लीपापोती से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।
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