ज्ञ या ग्ञ्
ज्ञ या ग्ञ
पर्याप्त समय से ज्ञ या ग्ञ के शास्त्रीय स्वरूप को लेकर ग्ञ-पक्ष को सिद्ध करने का असफल प्रयास किया जा रहा है। आईये, इस पर चिन्तन करते हैं -
१. वर्णों के स्वरूप-निर्धारण के लिए जहां व्याकरण के साथ ही शिक्षा एवं प्रातिशाख्य साहित्य हमें पर्याप्त सहयोग प्रदान करता है, वहीं व्यावहारिक परम्परा भी कम सहयोगी नहीं है।
२. व्यञ्जन का उच्चारण या लेखन स्वर के साथ किया जाता है (अन्वग् भवति व्यञ्जनम्)। जब दो या दो से अधिक व्यञ्जन एक साथ आते हैं तो उनका लिपि-प्रकार स्वतन्त्र लेखन से प्रायः भिन्न सा होता है। जैसे- क्+व= क्व, र्+व= र्व, क्+त =क्त, द्+ध=द्ध, ष्+ट=ष्ट, ट्+र=ट्र, द्+म=द्म, ध्+न=ध्न, श्+र=श्री, त्+र=त्र आदि। यहां सर्वत्र पूर्ववर्त्ती अच्-रहित व्यञ्जन उत्तरवर्त्ती अच्सहित व्यञ्जन के पूर्व अथवा ऊपर के भाग में लिखित है, साथ ही दोनों व्यञ्जनों का कुछ-कुछ अंश लेकर दोनों ध्वनियों का अभिव्यञ्जक एक नवीन लेखन-स्वरूप प्रदान किया गया है। ठीक इसी प्रकार क्+ष= क्ष तथा ज्+ञ=ज्ञ की भी स्थिति है। ज् में जो आगे नीचे की ओर घूमी हुई रेखा है उसमें ञ के आगे के अंश को मिला दिया तथा ञ में जो अच् की मात्रा से भिन्न एक छोटी सी रेखा है उसे नीचे की ओर लटका दिया तो ज्ञ का स्वरूप सामने आया।
३. वर्णज्ञान तथा शब्दज्ञान में अकारादि क्रम से शब्दों का बोध कराने के लिए कोश-परम्परा भी अतिशय प्राचीन प्रामाणिक परम्परा है। सभी प्राचीन तथा नवीन कोशों में ज्ञ से आरम्भ होने वाले शब्द ज के अनन्तर ही रखे गए हैं न कि ग के अनन्तर। यदि इस संयुक्त अक्षर का आदि अवयव ग् होता तो ग वाली शृङ्खला में रखना चाहिए था न कि ज वाली शृङ्खला में। यहां तक कि मूढता के कारण इस विकृत ग्ञ का उच्चारण करने वाले भी जब प्रातिशाख्य, सिद्धान्त कौमुदी आदि अथवा स्वरचित किसी ग्रन्थ के सूत्रों या पदों की अकारादि क्रम से सूची तैयार करते हैं तो ये भी इसी क्रम का आश्रयण करते हैं।
उच्चारण में ग्ञ तथा लेखन में ज्ञ, इस अर्धजरतीय का आधार क्या है ?
जिस यम के आगम से ज्ञ को ग्ञ सिद्ध करने का असफल कुप्रयास किया जा रहा है, शास्त्रवेत्ताओं की दृष्टि में वस्तुत: वह अशरीरी (लिपिप्रकार रहित) है अर्थात् वह केवल उच्चारण में ही है लेखन में नहीं, इसमें प्रमाण देखते हैं - "अशरीरं यमं विद्यात्" (या.शि. २०३)।
यह तो रही परम्परा की बात, अब शास्त्रीय दृष्टि से विचार करते हैं -
१. भट्टोजि दीक्षित शब्दकौस्तुभ (१.१.८) में लिखते हैं - "अशरीरमिति स्वरभक्त्यादिवद् व्यञ्जकलिपिविशेषशून्यमित्यर्थ:। लक्षणवशेनैव तदीयस्थलविशेषनिश्चयसम्भवाल्लिपिसम्प्रदायप्रवर्त्तकाचार्य्यै: स्वरभक्तेरिव यमस्यापि व्यञ्जकीभूता लिपिर्न कल्पितेत्यर्थ:।"
अत एव वाजसनेयि-प्रातिशाख्यकार (४.१६३) ने यम को वर्गों के पूर्ववर्त्ती चार स्पर्श वर्णों तथा पञ्चम वर्ण के मध्य विच्छेद के रूप में स्वीकार किया है- "अन्त:पदेऽपञ्चम: पञ्चमेषु विच्छेद:"। इसी सूत्र के उव्वटभाष्य में देखें- "विच्छेदो यम इत्यनर्थान्तरम्"।
वर्णस्वरूप न होने के कारण ही 'अकार, ककार' आदि के सदृश यम का निर्देश सर्वप्रसिद्ध 'कार'प्रत्यय (वा.प्रा.१.३७) के द्वारा नहीं होता- "न विसर्जनीयजिह्वामूलीयोपध्मानीयानुस्वारनासिक्यानाम्" (तै. प्रा. १.१८)।
२. शिक्षाकारों ने यमों को अयोगवाहों के अन्तर्गत रखा है। अयोगवाह से ऐसे वर्णध्वनियों का ग्रहण किया जाता है जिनका न तो साक्षात् उपदेश है और न ही सवर्णग्रहणक शास्त्र से ग्रहण सम्भव है पुनरपि स्थानादि-निर्देश की कार्यवेला में उनका आश्रय लिया जाता है। ककारादि रूप में मानने पर इनका अयोगवाहत्व नहीं रहता। वैयाकरणों ने वर्ण-सम्बन्धी सांहितिक आदि कार्य करते समय कहीं भी यमों का आश्रय नहीं लिया। यदि ये वर्ण होते तो विसर्जनीयानुस्वारादि की तरह इन्हें भी निमित्त-निमित्ति-व्यवधान आदि के रूप में स्वीकार करते।
३. वर्णों के उच्चारण-स्थान के निर्देश-प्रकरणों में सामान्यतः सभी ने यमों को विशुद्ध नासिक्य माना है। कॅं आदि के रूप में स्वीकार करने पर तो ये पञ्चम वर्णों के सदृश स्वस्थान-नासिकास्थान वाले हो जायेंगे।
४. यम चार ही हैं, जिनका निर्देश 'प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थ' (पा.शि.)अथवा 'कुॅं, खुॅं, गुॅं तथा घुॅं' (वा.प्रा. ८.२४) या 'कॅ्ं, कॅ्ं, गॅ्ं तथा घॅ्ं' (ऋ.प्रा.१.४८ उव्वटभाष्य) संज्ञाओं के द्वारा ही होता है, वर्गगत वर्ण के द्वारा नहीं। इस विषय में शब्दकौस्तुभ (१.१.८) में भट्टोजिदीक्षित का मत भी द्रष्टव्य है -" कचटतपा: कु:, खछठथफा: खु:, इत्यादिपरिभाषामाश्रित्य तत्तदुत्तरस्याशरीरस्यापि कथञ्चित्प्रदर्शनतात्पर्यकं चेदमिति ध्येयम्"।
५. आभ्यन्तर प्रयत्न जिनका सम्बन्ध आस्यगत स्थानों के साथ है, उनमें यमों का निर्देश नहीं है।
६. जिस प्रकार व्यञ्जन के उच्चारण के लिए अकार का सहयोग लिया जाता है लेकिन व्यञ्जन के साथ अकार व्यञ्जन नहीं होता, जिह्वामूलीय-उपध्मानीय के निर्देश के लिए 'क-प' वर्णों का आश्रय लेते हैं लेकिन 'क-प' वर्ण जिह्वामूलीय-उपध्मानीय नहीं होते। उसी प्रकार प्रथम आदि यम का निर्देश करने के लिए वर्गगत किसी न किसी वर्ण का आश्रय लेने से वह वर्गगत स्पर्श वर्णविशेष यम नहीं होता। अतः 'पलिक्कॅ्ंनी' आदि में भी पञ्चम वर्ण के सान्निध्य से स्पर्श वर्ण से उत्तर जो नासिक्य ध्वनि उच्चरित होती है, वही यम है न कि ककारादि वर्ण। पाणिनीय शिक्षा में आचार्य कौशिक के नाम से उद्धृत श्लोक में स्पष्ट निर्देश है - "पलिक्कॅ्ंनी चक्खॅ्ंनतुर्जग्गॅ्ंमिर्जघ्घॅ्ंनुरित्यत्र यद्वपु:।
नासिक्येनोक्तं कादीनां त इमे यमा:।। तेषामुकार: सस्थानवर्गीयलक्षक:।।"
७. पुनरपि दुर्जनतोष न्याय से यदि थोड़ी देर के लिए यमों का वर्णरूप मान भी लें तो ज् और ञ के मध्य विजातीय भिन्नवर्गीय गॅं कहां से आ गया ? आचार्य उव्वट को ही देख लेते, वे वा.प्रा. (४.११५) के "यमे" सूत्र में 'सञ्ज्ज्ञानमसि' "ञकार: जकारयमौ ञकारश्च संयोग:"। तथा वहीं सूत्र (४.१६३) में "यज्ज्ञ:, जकारयमौ ञकारश्च संयोग:।" कहकर जकार का ही निर्देश कर रहे हैं, गकार का नहीं।
यदि शास्त्र और परम्परा दोनों दृष्टियों से ज्+ञ=ज्ञ सिद्ध होने पर भी कोई विशुद्ध वैतण्डिक स्वरूप धारण कर 'सूत न कपास जुलाहे से लट्ठमलट्ठा' न्याय को चरितार्थ करते हुए इसे ग्ञ ही स्वीकार करता है तो निश्चित ही वह 'क्षेत्रिय' व्याधि से ग्रस्त के रूप में स्वीकरणीय है।
तत्त्वत: निर्णय के लिए 'वाद' की पुरातन स्वस्थ परम्परा रही है। 'वादे वादे जायते तत्त्वबोध:'। यदि पूर्वाग्रहों से सर्वथा मुक्त होकर स्वस्थ वातावरण में स्वस्थ मस्तिष्क से शास्त्र एवं परम्परा के शुद्ध स्वरूप को समक्ष रखकर इस विषय पर वाद किया जाय तो सभी के हित में रहेगा।
प्रदीप कुमार शास्त्री
९३०६९२४४३८
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