सर्वाइकल


 यह रोग गर्दन के आसपास के मेरुदंड की हड्डियों की बढ़ोतरी और सर्वाइकल वटेब्रे के बीच के इंटरवटेबल डिस्क में कैल्शियम का डी-जनरेशन,बहि:क्षेपन और अपने स्थान से सरकने की वजह से होता है। लगातार कम्प्यूटर या लैपटॉप पर बैठे रहना, बेसिक या मोबाइल फोन पर देर तक बात करना और फास्ट फूड व जंक फ़ूड का सेवन, कुछ प्रमुख कारण है। प्रौढ़ और वृद्धों में मेरुदंड में डी-जेनरेटिव बदलाव साधारण क्रिया है और इसके कोई लक्षण नहीं उभरते।नस पर दबाव पड़ने से लक्षण दिखते हैं। सामान्यत: 5,6,7, के बीच की डिस्क प्रभावित होती है।    


 ‌‌           *लक्षण*

इसके लक्षण तभी दिखाई देते हैं,जब सर्वाइकल नस में दबाव या खिंचाव होता है,तब ये समस्याएं भी हो सकती है ।


1. गर्दन में दर्द जो बाजू और कन्धों तक जाता है। 

2.  गर्दन में अकड़न, जिससे सिर हिलाने में तकलीफ होती है।

3. सिरदर्द विशेष कर सिर के पीछे भाग में 

4.  कंधों, बाजुओं और हाथ में जलन, झनझनाहट या असंवेदनशीलता। 

5. मितली,उल्टी,या चक्कर आना। 

6. कंधे, बांह,व हाथ की मांसपेशियों में कमजोरी तथा क्षति। 

7.   निचले अंगों में कमजोरी, मूत्राशय और मलद्वार पर नियन्त्रण न रहना।    


          *कारण*

एलोपैथी में दर्द निवारक दवा कुछ देर राहत देती हैं पर रोग वैसा ही बना रहता है। 


1.  लम्बे समय तक बैठे रहने या खड़े- खड़े काम करने से। 

2.  स्कूटर आदि वाहन गलत मुद्रा में चलाना 

3. आराम तलब और व्यायाम रहित दिनचर्या। 

4. संतुलित भोजन का सेवन न करना। 

5. मोटे तकिए पर सोना, कुछ लोग दो दो तकिया लगा कर सोते हैं,ये रोग उत्पन्न करते हैं। 

6.  सामने की ओर अधिक देर तक झुक कर रहना। 

7.  फोम के तकिये व गद्दे रोग के बड़े कारण है।

8.  मानसिक तनाव और ज्यादा भागदौड़ भी रोग को बढ़ाता है।    


  ‌      *प्राकृतिक चिकित्सा*  

इसके कई उपचार उपलब्ध है।इन उपचारों का उद्देश्य होता है


 1 नसों पर पड़ने वाले दबाव के लक्षण और दर्द कम करना 

2. स्थायी मेरुदंड और नस की जड़ पर होने वाले नुक़सान को रोकना। 

3.  आगे के डी-जनरेशन को रोकना 

4.  चिकित्सक की देखरेख में गर्दन की मांसपेशियों को मजबूत करने के व्यायाम से लाभ लेना ।

5.  इस बिमारी का एकमात्र इलाज योगासन तथा एक्यूप्रेशर व भरपूर आराम हैं। 


    ‌ *गर्दन की सूक्ष्म क्रियाएं*

 एनिमा जरुर लें। तनाव को कम करने के लिए शवासन, योगनिद्रा, ऊंकार जाप,ये सभी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।  प्राणायाम--- अनुलोम-विलोम प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम 


               *आहार*

 संतुलित पौष्टिक भोजन लें। जैसे-- हरी सब्जिया,फलो में तरबूज, पपीता, खरबूजा, आदि। भोजन में रागी का उपयोग करें। मेवों में बादाम, अंजीर, किशमिश आदि भिगोकर लें, भोजन समय पर लें। खाना चिन्ता मुक्त होकर, अच्छी तरह से चबा चबाकर खाएं।[[ सर्वाईकल ]]

जब गर्दन की हड्डियों में घिसावट होती है तब सर्वाइकल की समस्या होती है। इसे गर्दन के अर्थराइटिस के नाम से भी जाना जाता है। यह प्राय: वृद्धावस्था में होता है,लेकिन आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में ये युवाओं को भी अपनी चपेट में ले रहा है।


सर्विकल स्पॉन्डलाइसिस को अन्य दूसरे नाम सर्वाइकल ऑस्टियोआर्थराइटिस, नेक आर्थराइटिस, क्रॉनिक नेक पेन और आयुर्वेद में मन्यास्तम्भ के नाम से जाना जाता है।


कई बार गर्दन का दर्द हल्के से लेकर ज्यादा हो सकता है। ऐसा अक्सर ऊपर या नीचे अधिक बार देखने के कारण या गाड़ी चलाने, किताबें पढ़ने के कारण यह दर्द हो सकता है। पर्याप्त आराम और कुछ देर के लिये लेट जाना, काफी फायदेमंद होगा।


गर्दन में दर्द और गर्दन में कड़ापन स्थिति को गम्भीर करने वाले मुख्य लक्षण है।


सिर का दर्द, मुख्य रूप से पीछे का दर्द इसका लक्षण है।

गर्दन को हिलाने पर प्राय: गर्दन में कड़क जैसी आवाज़ का आना।

हाथ, बाजू और उंगलियों में कमजोरी या सुन्न हो जाना।

व्यक्ति को हाथ और पैरों में कमजोरी के कारण चलने में समस्या होना और अपना संतुलन खो देना।

गर्दन और कंधों पर अकड़न या अंगसंकोच होना।

पानी का ठण्डा पैकेट दर्द करने वाले क्षेत्र पर रखें।

आपने तंत्रिका तंत्र को हमेशा नम रखें।

गर्दन की नसों को मजबूत करने के लिये गर्दन का व्यायाम करें।

कम्प्यूटर पर अधिक देर तक न बैठें।

विटामिन बी और कैल्शियम से भरपूर आहार का सेवन करें।

पीठ के बल बिना तकिया के सोयें। पेट के बल न सोयें।


सर्वाइकल के लिए हमारा आयुर्वेदिक उपचार।


धतूरे के बीज 15 ग्राम, रेवंदचीनी 10 ग्राम, सोंठ 10 ग्राम, गर्म तवे पर फ़ुलाई हुई सफ़ेद फिटकरी 8 ग्राम, इसी तरह फ़ुलाया हुआ सुहागा 8 ग्राम, बबूल का गोंद 8 ग्राम। इन सब औषधियों को बारीक पीस लें और धतूरे के पत्तों के रस से गीला करके चने के दाने के (125 मिलीग्राम) बराबर गोलियां बना लीजिए। दिन में एक गोली गर्म जल से लीजिये। गोली भोजन करने के बाद ही लीजिए और ईसके साथ दो चम्मच दशमूल क्वाथ वातगजांकुश रस एक एक गोली दिन में दो बार सुबह शाम लें और आभादि गुग्गुल एक एक गोली दिन में दो बार सुबह शाम रास्नादि क्वाथ के दो चम्मच के साथ लें और महामाष तेल की तीन तीन बूंदे दोनों कानों व नाक में सुबह शाम डालिये।


तले हुए व तीखे भोजन से सख्त परहेज कीजिये। मात्र दो माह में आप इस समस्या से निजात पा जायेंगे।

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